सरश चनदर (Suresa Candra Jaina) जन – författare
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Engelska, 20052 326 kr
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यह पुस्तक आर्थिक सुधारों एवं ग्रामीण विकास के परिप्रेक्ष्य में नौकरशाही के प्रभावकारी प्रबंधन के प्रमख पहलओं पर प्रकाश डालती है। नौकरशाही में व्याप्त विभिन्न अपक्रियाओं की विस्तृत व्याख्या के साथ-साथ इस पुस्तक में उन्हें दूर करने के उपायों की भी चर्चा की गई है, जैसे: फाइलों तथा प्रकरणों को निपटाने के लिये समय-सीमा का न होना, गोपनीयता की आड़ में अफसरों द्वारा अपने गलत कार्यों को छिपाना, प्रभावकारी प्रोत्साहन एवं दण्डात्मक प्रक्रियाओं का न होना, अधिकारियों का व्यक्तिगत उत्तरदायित्व एवं जवाबदेही न होना, परिणाम-उन्मुखी प्रशासनिक व्यवस्था का न होना, विभाग प्रमुखों की नियुक्ति बिना व्यावसायिक विशेषज्ञता (professional specialization) के ही होना, ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में ग्राम पंचायत की स्वीकृति का न होना, जिले के कलेक्टर एवं एस.पी. का जिले से चुने हुए प्रतिनिधि के अधीन न होना, मंत्रियों एवं अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच शीघ्र न होना, सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली एवं आर्थिक सुधार, तथा सरकारी तंत्र को सुधारने के लिये सामाजिक आंदोलन, आदिआदि। ग्रामीण विकास के विभिन्न कार्यक्रमों की प्राथमिकताएं, ग्रामीणों की ग्रामीण विकास में सामूहिक भागीदारी, ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों का स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा लागू किया जाना, अप्रैल 1994 से पंचायती राज व्यवस्था का क्रियान्वयन, ग्राम पंचायत के परामर्श से विकास की योजनाएं बनाना आदि पर भी जोर दिया गया है।अनुशंसाएं मुख्यतः इस तथ्य पर आधारित हैं कि और्गेनाइजेशन डिवलपमेंट एवं मानव संसाधन प्रबंध के सिद्धांतों को नौकरशाही में भी क्रियान्वित किया जाए जैसी कि सभी सफल व्यावसायिक संगठनों में सामान्य प्रक्रिया है। गाजियाबाद जिले के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के विभिन्न वर्गों के पूर्व चयनित 234 प्रत्यर्थियों के विचारों पर आधारित इस पुस्तक में फील्ड सर्वेक्षण द्वारा एकत्रित आंकड़ों को 17 मूल सारणियों में प्रस्तुत किया गया है। प्रत्यर्थियों के विचारों के निष्कर्ष बारंबारता एवं विषय-वस्तु विश्लेषणों के आधार पर निकाले गये हैं। इस प्रकार यह पुस्तक भारत के बारे में एक तृणमूल अध्ययन है।
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यह पुस्तक भारत में पुलिस एवं न्याय व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जैसे सामान्यतः सभी व्यक्तियों को, विशेषकर करोड़ों गरीब एवं अशिक्षित व्यक्तियों को, सस्ता एवं शीघ्र न्याय देने में पुलिस तथा अदालतों की नाकामयाबी, एवं न्याय शीघ्र न होने से भ्रष्टाचार के आरोपित राजनीतिज्ञों, मंत्रियों एवं अधिकारियों का अपने पदों पर बने रहने से आम जनता में रोष, आम जनता का पुलिस थानों में भरोसा एवं विश्वास नहीं, राजनीतिक पदाधिकारियों, मंत्रियों (एम.पी. एवं एम.एल.ए.) एवं अधिकारियों के लिये जनता की सहभागिता से विशेष अदालतों का गठन, अंग्रेजों के सरकारी गोपनीयता कानून, 1923 को रद्द किया जाना, पुलिस थानों एवं अदालतों में जिला स्तर पर क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों की सहभागिता, आदि, आदि।इस पुस्तक में प्रस्तावित किया गया है कि सस्ते और शीघ्र न्याय की वैकल्पिक व्यवस्था वर्तमान केन्द्रीकृत अंग्रेजी न्यायिक व्यवस्था के मुकाबले, भारत में पूर्व प्रचलित “पंच परमेश्वर” व्यवस्था पर आधारित होनी चाहिये, जो कि भारत के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द्र द्वारा लिखित एक कहानी का शीर्षक है। इस व्यवस्था से पक्के सबूतों के अभाव, आमतौर पर अदालतों में प्रश्न चिन्ह लगा पुलिस रिकार्ड, एवं पेचीदे कानूनी दाव-पेचों की आड़ में आरोपित, (अ) अगर दोषी है तो तुरंत ही दंडित होने से बच नहीं सकते, एवं (ब) अगर दोषी नहीं है तो तुरंत ही निर्दोष सिद्ध हो जायेंगे।गाजियाबाद जिले के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के विभिन्न वर्गों के पूर्व चयनित 153 प्रत्यर्थियों के विचारों पर आधारित इस पुस्तक में फील्ड सर्वेक्षणद्वारा एकत्रित आंकड़ों को 16 मूल सारणियों में प्रस्तुत किया गया है। प्रत्यर्थियों के विचारों के निष्कर्ष बारंबारता एवं विषय-वस्तु विश्लेषणों के आधार पर निकाले गये हैं। इस प्रकार भारत की पुलिस एवं न्यायिक व्यवस्था के बारे में यह पुस्तक एक तृणमूल (grassroots level) अध्ययन है।