सरय परसाद (Sarayu Prasada Caube) चौब – författare
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Engelska, 20022 326 kr
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अब समाज की विविध विषमताओं को समझने तथा उनके समाधान की खोज के लिए सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन विशेष महत्त्व का हो गया है। इस पुस्तक में यह स्पष्ट करने की चेष्टा की गई है कि हमारी सामाजिक समस्याओं की उत्पत्ति में कौन कौन से कारक प्रमुख भूमिकाएं अदा करते हैं। ये कारक शताब्दियों से मानव मन को कुरेदते रहे हैं। इन कारकों की ओर इस पुस्तक में स्पष्ट संकेत किया गया है। पुस्तक की इस विशिष्टता के कारण इस रचना का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। स्नातक तथा स्नातकोत्तर कक्षाओं में पढ़ाये जाने वाले “सामाजिक मनोविज्ञान” के पाठ्यक्रम के अनुसार इस पुस्तक की रचना की गई है। ऐसी आशा है कि इन कक्षाओं के लिए यह रचना बहुत ही उपयोगी होगी।
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Engelska, 20041 347 kr
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यह पुस्तक किशोर मनोविज्ञान के मूल तत्वों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करती है। किशोरावस्था को परिभाषित करने के अलावा यह उनमें आने वाले शारीरिक परिवर्तनों एवं उनके मनोवैज्ञानिक महत्व पर भी प्रकाश डालती है। इस पुस्तक में किशारों में संवेगात्मक व्यवहार, उनकी व्यक्तिगत एवं सामाजिक रुचियों, मनोरंजन संबंधी रुचियों, काम-संबंधी भावनाओं, उनमें सामाजिक व्यवहार, धार्मिक जागृति, नैतिकता, उनकी अपेक्षाओं एवं निदेशन का विस्तार से वर्णन किया गया है। नवविवाहित किशोरों की कठिनाइयों की भी चर्चा की गई है। यह पुस्तक मनोविज्ञान के स्नातक, परास्नातक, बी.एड. तथा एम.एड. के विद्यार्थियों और समस्त माता-पिताओं के लिए बहुत उपयोगी है।
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यह पुस्तक विश्व के कुछ विकासशील देशों जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन और रूस की शिक्षा व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। इन देशों की वर्तमान शिक्षा के स्वरूप, उद्देश्य, संगठन, नियंत्रण, प्रशासन तथा उनकी समस्याओं की विवेचना के साथ.साथ यह उनकी पूर्व. प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक शिक्षाए माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, अध्यापक शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षा के विकास पर भी प्रकाश डालती है। इस पुस्तक में भारतीय शिक्षा के वर्तमान स्वरूप के साथ. साथ उसकी विभिन्न समस्याओं पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है।
2 171 kr
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प्रो. सरयू प्रसाद चौबे का जन्म वाराणसी जनपद के एक ग्रामीण क्षेत्र में फरवरी, 1919 में हुआ | बनारस से एम.ए. तथा इलाहाबाद से एम.एड. किया। 1950 में यू.एस.ए. के इण्डियाना विश्वविद्यालय ने शिक्षाशास्त्र में डाक्टरेट डिग्री हेतु अनुसंधान करने के लिए फेलो नियुक्त किया। इसके फलस्वरूप इन्हें डॉक्टर ऑफ एजूकेशन की डिग्री 1952 में प्रदान की गई।शिक्षा क्षेत्र में इनकी विविध रचनाओं के उपलक्ष्य में एक "अन्तर्राष्ट्रीय निर्णायक समिति" ने इन्हें 1963 में “जी.जे. वातूमल मेमोरियल अवार्ड इन एजूकेशन" से विभूषित किया ।लखनऊ विश्वविद्यालय ने 1965 में इन्हें डी.लिट. की डिग्री दी। साथ ही, इस विश्वविद्यालय ने इस सत्र में किये गये सर्वोच्च अनुसंधान हेतु बनर्जी रिसर्च पुरस्कार भी इन्हें दिया।लखनऊ विश्वविद्यालय में वर्षों तक अध्यापनकार्य करने के बाद ये 1969 में गोरखपुर । विश्वविद्यालय में नियुक्त हुये, और यहीं से ये 1979 में प्रोफेसर ऑफ एजूकेशन तथा डीन पद से अवकाश प्राप्त किया।डा. चौबे ने "शिक्षा-शास्त्र" तथा "मनोविज्ञान'' के क्षेत्र में 50 से अधिक ग्रन्थों की रचना की है। इनके द्वारा हिन्दी तथा अंग्रेजी में रचित पुस्तकें विश्वविद्यालयों में पढ़ायी जाती हैं। फलतः देश के सभी विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों के पुस्तकालयों में इनकी पुस्तकें संग्रहीत हैं।
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Engelska, 20061 796 kr
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अब विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के मनोविज्ञान तथा शिक्षा-शास्त्र और बी.एड. तथा एम.एड. के विद्यार्थियों के लिए मनोविज्ञान के कुछ प्रयोग करना अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसे ही छात्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक में कुछ प्रमुख प्रयोगों को करने की विधि को समझाने का प्रयास किया गया है। ये प्रयोग प्रमुखतः संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, साहचर्य, संवेग, स्मृति, अवधान, प्रतिमा और कल्पना, प्रतिक्रिया काल, कार्य और थकान, अधिगम, बुद्धि, व्यक्तित्व, चिन्तन, रुचि, व्यक्ति-वृत्त आदि क्षेत्रों से संबंधित हैं। साथ ही, इस पुस्तक में कुछ आवश्यक सांख्यिकीय सूत्रों की विवेचना भी की गई है।