जगराम (Jagarama Simha) सिह – författare
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उत्सवः हमारे प्राण (Utsavaḥ Hamāre Prāṇa)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
480 kr
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ईश्वर ही सत्य स्वरूप है यह सत्य की स्थापना ही धर्म स्थापना है। धर्म स्थापना अथार्त राष्ट्र का पुनर्निर्माण, पुनर्निर्माण तो सक्षम, सबल, सुदृढ़ समाज से ही संभव, ऐसा समाज तो आदर्श परिवारों से ही बन सकता है, यह परिवार का ताना-बाना रिश्तों की डोर से गुंथा होता है, रिश्ते व्यक्तियों से बनते-बिगड़ते हैं। …
राष्ट्र के गौरव (Rāṣṭra Ke Gaurava)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
591 kr
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अतीत से वर्तमान का भाग्य सूर्य प्रखर तेजस्वी होता है। भविष्य के सपनों को गगनचुम्बी उड़ान भरने हेतु सशक्त, सुदृढ़ परों की उपलब्धि होती है। विजयशाली, गौरवशाली इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षर बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है। किसी भी जीवंत समाज के उत्थान-पतन का माध्यम या कारण होता है। आदर्शों से …
समरसता के भगीरथ (Samarasatā Ke Bhagīratha)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
485 kr
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लाखों वर्षों की परकीय सत्ता के कारण समाज के मूलभूत ढाँचे में जो विकृत्ति उत्पन्न हुई, जिसके चलते विषमता जैसी घोर नारकीय प्रवृत्ति ने वीभत्स रूप धारण किया जिसके फलस्वरूप समाज का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया और लाखों वर्षों की ट्टषि-मुनियों की साधना मानो निष्फल हो गई, राम-राज्य वाला समाज अंतर्द्वन्द …
काव्यांजलि तेज (Kāvyāṃjali Teja)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
391 kr
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धीरे- धीरे शब्द जब तारुण्य वय को प्राप्त होते हैं तो उनमें निराशा में आशा, संघर्ष में परिणाम, परिश्रम में उत्साह, लक्ष्य में समर्पण, दुर्गमता में सुगमता, असहजता में सहजता, प्रतिकूलता में अनुकूलता आदि देव दुर्लभ सद्गुण सहज ही लौह कवचयुक्त उदात्त भाव जीवन में प्रवेश करते हैं और पथ पर चलने वाले हर …
काव्यांजलि प्रभात (Kāvyāṃjali Prabhāta)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
591 kr
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समाज का ताना - बाना, उसकी रीति - नीति, व्यवहार, आचरण, परम्पराएँ, उत्सव आदि पग - पग पर दिशाबोध कराते साथ ही विधि - निषेध आदि का सशक्त अपितु ममतायुक्त आलिंगन आदि से गुंथा हुआ है। उसी के कारण समाज का जागरण, संगठन, संस्कार, लक्ष्य स्मरण, स्व का भान, नवनिर्माण, स्वयं का उदाहरण जैसे आदि श्रेष्ठ …
काव्यांजलि किरण (Kāvyāṃjali Kiraṇa)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
368 kr
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जब बालक मां की गोद से उतरकर धरती मां की गोदी में पैर रखता अथार्त सान्निध्य पाता है तो वह अपने नवनयनों से वृहद् संसार का अनुभव करता है। जिस प्रकार सूर्य क्षितिज के वक्ष को चीरकर प्रथम झलक में प्रखर तीक्ष्ण प्रभाव के साथ अवनि पर तेज रूप में अवतरित होता है, उसी प्रकार भाव भी प्रारम्भिक दिनों की भांति …
काव्यांजलि उदय (Kāvyāṃjali Udaya)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
368 kr
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चैतन्य युक्त समाज जब स्वयं से जागकर उठने का प्रयत्न रूपी अनुष्ठान प्रारम्भ करता है तो प्रथमत: उसके सन्मुख परिलक्षित परिजन - पुरजन देशकाल परिस्थिति की अच्छी - बुरी झलक आँखों के सन्मुख प्रतिबिंबित होती है। उसी तीव्र उत्कण्ठा में अपनों की खोज करता, बारी - बारी से ममता भरी दृष्टि से निहारता, नूतन दिवस …
सेतुबंध (Setubaṃdha)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
572 kr
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मानव-मूल्यों के सोपानों पर पैर रखते हुए पशुत्व से नारायणत्व की महायात्रा पूर्णकर अपने जीवन को सार्थक करता है और भावी पगडंडियों हेतु अमिट पदचिन्ह पथावलोकन हेतु छोड़कर भूत का सुखद आभास कराता है। जिससे हर मानवीय संवेदना आचरण हेतु प्रबल अवलंवन प्राप्त कर सृष्टि में अपने आत्मीय आलिंगन से भोर का द्वार …
सामाजिक क्रांति के शिल्पी (Sāmājika Krāṃti Ke Śilpī)
Av जगराम (Jagarama Simha) सिह
E-bok, 2019
591 kr
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आज चहुँओर डार्विन के विकासवाद की जो चर्चाएँ चल रही हैं, उससे पश्चिम का जनमानस तो पूर्णतः प्रभावित है ही, साथ ही हमारा घर भी अब अछूता नहीं रहा है। हमारी भावी पीढी आज उसी का गुणगान करने को आतुर हो रही है, जबकि यह सत्यता की कसौटी से परे है। जब पश्चिम को मनुष्य होने का भान भी नहीं था। तब हमने वेद जैसे …